उत्तराखंड में 13 लाख टन पुराना कचरा बना संकट, 50 डंपिंग साइटों पर अटका निस्तारण

उत्तराखंड में 13 लाख टन पुराना कचरा बना संकट, 50 डंपिंग साइटों पर अटका निस्तारण

उत्तराखंड में पुराने कचरे की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है। राज्य के 50 से अधिक डंपिंग स्थलों पर करीब 12.82 लाख मीट्रिक टन पुराना कचरा जमा है। अब तक राज्य का कोई भी शहर इस लिगेसी वेस्ट का पूर्ण निस्तारण नहीं कर पाया है। कचरे के खुले में पड़े रहने से पर्यावरण, भूजल और जनस्वास्थ्य पर खतरा बढ़ रहा है।

आंकड़ों के अनुसार, अब तक केवल करीब 27 प्रतिशत लिगेसी वेस्ट का ही प्रसंस्करण हो सका है। शेष 12 लाख मीट्रिक टन से अधिक कचरा अब भी डंपिंग साइटों पर मौजूद है। देहरादून और हरिद्वार में कचरे की मात्रा सबसे अधिक है, लेकिन पर्वतीय जिलों में भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। अल्मोड़ा, बागेश्वर और पिथौरागढ़ जैसे जिलों में कचरा निस्तारण की प्रक्रिया अभी शुरुआती चरण में ही है।

स्वच्छ भारत मिशन 2.0 के तहत 13 नगर निकायों में 14 परियोजनाओं की डीपीआर स्वीकृत की गई है। आठ डंपिंग साइटों के लिए धनराशि भी जारी हो चुकी है। इसके बावजूद तकनीकी दिक्कतों, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और धीमी कार्यप्रणाली के कारण काम अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सका। कई स्थानों पर परियोजनाएं अधूरी हैं या बेहद धीमी रफ्तार से चल रही हैं।

इस बीच उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का उदाहरण चर्चा में है। वहां शिवरी डंपिंग साइट पर करीब 6.5 लाख मीट्रिक टन पुराने कचरे का निस्तारण छह माह में कर दिया गया। यह मॉडल अब उत्तराखंड के लिए एक संभावित समाधान के रूप में देखा जा रहा है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देहरादून में करीब 7,14,418 मीट्रिक टन, हरिद्वार में 3,30,586 मीट्रिक टन, नैनीताल में लगभग 79,500 मीट्रिक टन, पिथौरागढ़ में 39,508 मीट्रिक टन और ऊधमसिंह नगर में करीब 11,000 मीट्रिक टन पुराना कचरा जमा है। ये आंकड़े राज्य में समस्या की गंभीरता को दर्शाते हैं।

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शहरी विकास विभाग का कहना है कि आने वाले समय में नए कचरा प्रसंस्करण संयंत्र शुरू होंगे। विभाग के अनुसार बाधाओं के कारण देरी हुई, लेकिन स्थिति में सुधार की उम्मीद है। वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि स्पष्ट समयसीमा और मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना लिगेसी वेस्ट संकट से निपटना मुश्किल होगा।

Saurabh Negi

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