उत्तराखंड में लंबे सूखे का असर, चमोली में गेहूं और सरसों की फसलें प्रभावित

उत्तराखंड में लंबे समय से जारी शुष्क मौसम का असर अब खेती पर साफ दिखाई देने लगा है। चमोली जिले में गेहूं और सरसों की फसलों को 20 से 25 प्रतिशत तक नुकसान पहुंच चुका है। नवंबर के बाद से बारिश और पर्याप्त बर्फबारी नहीं होने से रबी फसलों की बढ़वार बाधित हुई है।
किसानों का कहना है कि नमी की भारी कमी के कारण गेहूं की वृद्धि धीमी हो गई है। वहीं सरसों की फसल समय से पहले पीली पड़ने लगी है। यह स्थिति फसल पर मौसम के दबाव को दर्शाती है। खेतों में नमी नहीं रहने से उत्पादन पर सीधा असर पड़ रहा है।
नंदानगर विकासखंड के सैती गांव के मथुरा प्रसाद त्रिपाठी, लांखी के मोहन सिंह डानू, बंगाली गांव के दिनेश सिंह नेगी और भेंटी गांव के सूरी कठैत ने बताया कि यदि जल्द बारिश नहीं हुई तो फसलें पूरी तरह खराब हो सकती हैं। किसानों ने कहा कि अब वे बसंत पंचमी के आसपास होने वाली परंपरागत बारिश की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
चमोली के मुख्य कृषि अधिकारी जेपी तिवारी ने फसलों को हुए नुकसान की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि जिले में गेहूं और सरसों की फसलें अब तक 20 से 25 प्रतिशत तक प्रभावित हो चुकी हैं। उन्होंने कहा कि यदि आने वाले दिनों में बारिश नहीं हुई तो जौ और मसूर की फसलों पर भी बुरा असर पड़ सकता है। इससे कुछ क्षेत्रों में सूखे जैसे हालात बन सकते हैं।
उच्च हिमालयी क्षेत्रों में हल्की बर्फबारी जरूर हुई है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं मानी जा रही है। बड़े इलाकों में जमीन सूखी बनी हुई है। इससे निचले और मध्यम ऊंचाई वाले गांवों में मिट्टी की नमी घट गई है और कृषि उत्पादकता पर असर पड़ा है।
मौसम की इस स्थिति का असर शीतकालीन पर्यटन पर भी पड़ा है। औली, नीति घाटी, उर्गम घाटी और आसपास के क्षेत्रों में पर्यटन गतिविधियां सुस्त हैं। आमतौर पर सर्दियों में बर्फबारी से पर्यटकों की संख्या बढ़ती है, लेकिन इस बार बर्फ नहीं पड़ने से आवाजाही कम रही है।
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औली जैसे पर्यटन स्थलों में दो महीनों के भीतर साल की बड़ी आय होती है। बर्फबारी में देरी से स्थानीय कारोबारियों की चिंता बढ़ गई है। किसान और पर्यटन से जुड़े लोग अब मौसम में बदलाव का इंतजार कर रहे हैं। आने वाले सप्ताह खेती और पर्यटन दोनों के लिए अहम माने जा रहे हैं।




