उत्तराखंड में वन्यजीव हमलों में बढ़ोतरी, 19 दिनों में छह लोगों की मौत
उत्तराखंड में मानव और वन्यजीव संघर्ष एक बार फिर गंभीर चिंता का विषय बन गया है। राज्य में बीते 19 दिनों के भीतर वन्यजीव हमलों में छह लोगों की जान चली गई है। इनमें चार मौतें बाघ के हमलों में दर्ज की गई हैं।
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, ठंड बढ़ने और शीतनिद्रा के कारण भालू के हमलों में कमी की उम्मीद थी। इसके बावजूद भालू से जुड़े मामलों की रिपोर्ट मिल रही है। भालू के बाद अब बाघ वन सीमावर्ती क्षेत्रों में बड़ा खतरा बनकर उभरे हैं।
अधिकारियों के मुताबिक इस महीने बाघ के हमलों में चार लोगों की मौत हुई है। ये घटनाएं कालागढ़ टाइगर रिजर्व, रामनगर और तराई पूर्वी वन प्रभाग क्षेत्रों में हुईं। इसके अलावा तेंदुए के हमलों में दो लोगों की जान गई है। इनमें एक महिला नैनीताल वन प्रभाग में और एक पुरुष पौड़ी जिले के बारा गांव में मारा गया।
पिछले वर्ष के आंकड़े स्थिति की गंभीरता को दर्शाते हैं। बीते साल तक उत्तराखंड में मानव और वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में 68 लोगों की मौत हुई थी। इन घटनाओं में 488 लोग घायल भी हुए थे। इसके साथ ही पशुधन, फसलों और संपत्ति को भी नुकसान पहुंचा था।
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2025 में ही बाघ के हमलों में 12 लोगों की जान गई है। इन घटनाओं में पांच लोग घायल हुए हैं। वहीं तेंदुए के हमलों में 19 लोगों की मौत और 102 लोग घायल हुए हैं। ये घटनाएं राज्य के विभिन्न वन प्रभागों में दर्ज की गईं।
मुख्य वन संरक्षक रंजन मिश्रा ने बताया कि यह अवधि बाघों के प्रजनन काल से जुड़ी होती है। इस दौरान बाघों की आवाजाही वन क्षेत्रों से बाहर बढ़ जाती है। उन्होंने लोगों को इस समय जंगल में जाने से बचने की सलाह दी है।
उन्होंने कहा कि अत्यावश्यक कार्य के लिए जंगल जाने वालों को समूह में चलना चाहिए। साथ ही सतर्क रहने और शोर करते हुए आगे बढ़ने की सलाह दी गई है। इससे हमले के खतरे को कम किया जा सकता है।
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वन विभाग की ओर से जागरूकता अभियान और सावधानी संबंधी उपाय किए जा रहे हैं। इसके बावजूद लगातार हो रही मौतें जमीनी स्तर पर और ठोस कदमों की जरूरत को दर्शाती हैं। विशेष रूप से उन इलाकों में जहां मानव बस्तियां और वन्यजीव क्षेत्र एक-दूसरे से सटे हुए हैं।




