उत्तराखंड में 13 ग्लेशियल झीलें हाई रिस्क, नेपाल की बाढ़ के बाद केदारनाथ जैसी आपदा का खतरा फिर चर्चा में

देहरादून: नेपाल में हालिया बाढ़ की घटना के बाद हिमालयी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन और समय रहते चेतावनी देने की व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ गई है। उत्तराखंड में वैज्ञानिकों ने पांच जिलों में 13 संभावित उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों की पहचान की है। इन झीलों को राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के स्तर पर भी उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है।

इन झीलों से जुड़े संभावित खतरों का वैज्ञानिक अध्ययन किया जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, ग्लेशियरों और उनसे जुड़ी झीलों के नीचे बसे क्षेत्रों में अचानक आने वाली बाढ़ के खतरे को देखते हुए लगातार निगरानी, प्रभावी चेतावनी तंत्र और समय पर सुरक्षित स्थानों पर लोगों को पहुंचाना जरूरी है।

केदारनाथ आपदा आज भी बड़ी चेतावनी

उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों के खतरे को समझने के लिए जून 2013 की केदारनाथ आपदा सबसे बड़ा उदाहरण है।

16 और 17 जून 2013 को चोराबाड़ी ताल के फटने के बाद केदारनाथ में भारी बाढ़ आई थी। इस आपदा में केदारपुरी का बड़ा हिस्सा मलबे में दब गया था। केदारनाथ मंदिर को छोड़कर आसपास का क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ था। आपदा में करीब 6,000 लोगों की जान गई थी

नेपाल की घटना ने बढ़ाई चिंता

नेपाल में 26 अगस्त को ग्लेशियल क्षेत्र से जुड़ी अचानक आई बाढ़ की घटना ने हिमालयी क्षेत्रों में आपदा की पूर्व चेतावनी और बचाव तैयारियों की चुनौतियों को फिर सामने ला दिया है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, नेपाल में हुई इस आपदा में अब तक 1,127 लोगों की मौत और 4,800 से अधिक लोगों के लापता होने की सूचना है। प्रभावित क्षेत्रों में खोज और बचाव अभियान जारी है।

उत्तराखंड के संदर्भ में इस घटना ने संवेदनशील ग्लेशियल झीलों की वैज्ञानिक निगरानी और उनके नीचे बसे क्षेत्रों के लिए प्रभावी निकासी योजना की आवश्यकता को फिर रेखांकित किया है।

उत्तराखंड में सैकड़ों ग्लेशियल झीलें

उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में बड़ी संख्या में ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार चमोली में सबसे अधिक 192 झीलें, उत्तरकाशी में 83, पिथौरागढ़ में 40, रुद्रप्रयाग में 11, टिहरी में 10 और बागेश्वर में आठ ग्लेशियल झीलें दर्ज हैं।

जिला ग्लेशियल झीलें
चमोली 192
उत्तरकाशी 83
पिथौरागढ़ 40
रुद्रप्रयाग 11
टिहरी 10
बागेश्वर 8

इन झीलों का विस्तार राज्य की विभिन्न नदी घाटियों में है। उपलब्ध आंकड़ों में अलकनंदा बेसिन में 635, भागीरथी बेसिन में 306 और गोरी गंगा बेसिन में 92 ग्लेशियल झीलें दर्ज हैं।

इसके अलावा धौलीगंगा, कुटी यांगती, टोंस, यमुना, भिलंगना, मंदाकिनी और पिंडारी नदी घाटियों में भी ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं।

इन झीलों पर विशेष निगरानी की जरूरत

उच्च जोखिम वाली झीलों में चमोली की वसुधारा और सरस्वती ताल, उत्तरकाशी की केदारताल, बागेश्वर की नागकुंड, पिथौरागढ़ की माबंग, प्यूंगरू और स्यूंतियांकती तथा टिहरी की मसूरी ताल समेत अन्य झीलें शामिल हैं।

विशेषज्ञों के सामने चुनौती केवल संवेदनशील झीलों की पहचान तक सीमित नहीं है। इनकी लगातार वैज्ञानिक निगरानी, जलस्तर में बदलाव की जानकारी, प्रभावी पूर्व चेतावनी और निचले क्षेत्रों के लिए स्पष्ट निकासी योजना तैयार करना भी जरूरी है।

नेपाल की हालिया घटना के बाद उत्तराखंड में इन व्यवस्थाओं की प्रभावशीलता पर ध्यान बढ़ना स्वाभाविक है, क्योंकि हिमालयी क्षेत्रों में किसी ग्लेशियल झील के अचानक टूटने से नीचे की घाटियों में बेहद कम समय में बड़े पैमाने पर बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है।

 

Saurabh Negi

Share