धराली पर अब भी मंडरा रहा टेलीगाड़ झील का खतरा, एक साल बाद भी नहीं हुआ स्थायी समाधान
उत्तरकाशी के धराली और हरसिल क्षेत्र में टेलीगाड़ झील का खतरा एक वर्ष बाद भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। स्थानीय लोगों का कहना है कि भूस्खलन से बनी झील और नदी किनारे जमा भारी मलबा आज भी बड़े हादसे का कारण बन सकता है। लगातार बारिश के बीच ग्रामीण स्थायी सुरक्षा उपायों की मांग कर रहे हैं।
पिछले महीने टेलीगाड़ और भागीरथी नदी में जलस्तर बढ़ने से हरसिल क्षेत्र में तेज कटाव हुआ था। इससे कई आवासीय भवनों और सरकारी परिसंपत्तियों पर खतरा पैदा हो गया। जीएमवीएन का एक टिन शेड भी बह गया, जबकि सेना शिविर के पास बड़े पेड़ों के गिरने से नदी का प्रवाह फिर से अवरुद्ध होने की आशंका बनी। इसके बाद प्रशासन ने अस्थायी रूप से नदी की चैनलाइजेशन और सुरक्षा कार्य कराए, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि इससे खतरा पूरी तरह नहीं टला है।
ग्रामीणों का कहना है कि टेलीगाड़ के मुहाने पर भूस्खलन से बनी झील अब भी मौजूद है। यदि लगातार भारी बारिश होती है तो झील टूटने या दोबारा पानी का दबाव बढ़ने से बड़ा नुकसान हो सकता है। प्रशासन ने नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (निम) के विशेषज्ञों से सर्वे कराने की घोषणा की थी, लेकिन अब तक सर्वे नहीं हो सका है।
धराली के ग्राम प्रधान अजय नेगी ने कहा कि अब तक केवल नदी का बहाव बदला गया है, जबकि स्थायी सुरक्षा कार्य नहीं हुए हैं। उन्होंने बताया कि हाल ही में खीर गंगा का जलस्तर बढ़ने पर वैकल्पिक गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग भी खतरे की जद में आ गया था।
पुराने धराली में रहने वाले करीब 115 लोगों को मानसून के दौरान घर खाली करने के नोटिस दिए गए हैं। इससे स्थानीय लोग लगातार भय के माहौल में रह रहे हैं।
इसी बीच, 5 अगस्त को धराली आपदा की पहली बरसी पर ग्रामीणों ने आपदा में जान गंवाने वाले लोगों को श्रद्धांजलि दी। गांव में विशेष प्रार्थना सभा आयोजित की गई और मृतकों की स्मृति में 101 पौधे लगाए गए। ग्रामीणों ने निर्णय लिया कि हर वर्ष 5 अगस्त को पौधरोपण कर आपदा में जान गंवाने वालों को याद किया जाएगा।
