उत्तराखंड में नमामि गंगे योजना पर कैग की रिपोर्ट, देवप्रयाग से हरिद्वार तक 32 गुना बढ़ा कोलीफॉर्म स्तर
उत्तराखंड में नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत सीवेज प्रबंधन में कई कमियां सामने आई हैं। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट के अनुसार, देवप्रयाग से हरिद्वार के बीच करीब 93 किलोमीटर के क्षेत्र में गंगा के पानी में कुल कोलीफॉर्म का स्तर 32 गुना बढ़ गया। यह आंकड़ा अक्टूबर 2023 तक के जल गुणवत्ता संबंधी आंकड़ों पर आधारित है।
वर्ष 2018 से 2023 तक किए गए इस ऑडिट में सीवेज शोधन संयंत्रों के संचालन और उनके उपयोग में कमियां पाई गईं। जांचे गए 37 संयंत्रों में से 12 से गंगा और उसकी सहायक नदियों में बिना शोधन वाला सीवेज छोड़ा जा रहा था। वहीं, सात नगरों में 21 संयंत्रों को घरेलू सीवर कनेक्शन ही नहीं मिले थे। इससे उनकी उपयोगिता प्रभावित हुई।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि कई संयंत्रों की शोधन क्षमता पर्याप्त नहीं थी। नालों को सीवेज नेटवर्क से जोड़ने की व्यवस्था प्रभावी नहीं होने के कारण गंदा पानी सीधे नदियों में पहुंच रहा था। कुछ संयंत्र राष्ट्रीय हरित अधिकरण के निर्धारित मानकों के अनुरूप भी संचालित नहीं हो रहे थे।
कई शहरों में घरों को नहीं मिले सीवर कनेक्शन
कैग की रिपोर्ट के अनुसार, श्रीनगर में 6,523 घरों में से केवल 797 घर सीवर नेटवर्क से जुड़े थे। यह कुल घरों का 12.22 प्रतिशत है। चमोली-गोपेश्वर में 5,510 में से 354 घरों को कनेक्शन मिला था, जबकि उत्तरकाशी के ज्ञानसू में 6,089 में से 572 घर सीवर नेटवर्क से जुड़े थे।
श्रीनगर के सीवेज शोधन संयंत्र को उत्तराखंड जल संस्थान ने कमियां बताते हुए अपने अधीन लेने से भी इनकार कर दिया था। हरिद्वार में 68,802 घरों में से 47,728 घर सीवर नेटवर्क से जुड़े थे। वहीं, ऋषिकेश, तपोवन और मुनि की रेती में कुल 34,756 घरों में से 9,966 घरों को ही यह सुविधा मिली थी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल सीवेज शोधन संयंत्र बनाना पर्याप्त नहीं है। जब तक घरों को सीवर नेटवर्क से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक सीवेज का प्रभावी शोधन सुनिश्चित करना मुश्किल रहेगा।
देवप्रयाग से हरिद्वार तक गंगा में बढ़ा कोलीफॉर्म
हरिद्वार के हरकी पैड़ी और देवप्रयाग में एक दशक के दौरान दर्ज जल गुणवत्ता के आंकड़ों की तुलना में कोलीफॉर्म स्तर में बड़ा अंतर सामने आया। अक्टूबर 2023 तक देवप्रयाग से हरिद्वार के बीच इसका स्तर 32 गुना बढ़ चुका था। रिपोर्ट ने बिना शोधन वाले सीवेज के नदी में पहुंचने को इसका प्रमुख कारण बताया।
कैग ने यह भी पाया कि श्रीनगर, उत्तरकाशी, टिहरी, चमोली, रुद्रप्रयाग, देहरादून और हरिद्वार की जिला गंगा समितियों ने नदी बेसिन प्रबंधन योजनाएं तैयार नहीं की थीं। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार ने सीवेज विकास पर 55.08 करोड़ रुपये खर्च किए, जबकि गंगा किनारे बसे नगरों में सीवरेज व्यवस्था के विस्तार पर कोई राशि खर्च नहीं की गई।
होटल और रेस्तरां के सीवेज पर भी उठे सवाल
स्पर्श गंगा अभियान के पूर्व विशेष कार्याधिकारी और वरिष्ठ रसायनविद् प्रोफेसर पीपी बदोनी ने धारासू से गंगोत्री तक बैक्टीरियोफेज का स्तर 1,100 प्रतिशत दर्ज होने की बात कही। उनके अनुसार, यह पानी को सुरक्षित बनाने में मदद करता है। उन्होंने देवप्रयाग से ऋषिकेश के बीच कोलीफॉर्म स्तर बढ़ने में होटल और रेस्तरां से निकलने वाले सीवेज की भूमिका होने की आशंका भी जताई।
कैग की रिपोर्ट में सामने आई कमियां सीवेज शोधन संयंत्रों के बेहतर संचालन, घरेलू सीवर कनेक्शन बढ़ाने और बिना शोधन वाले गंदे पानी को गंगा तथा उसकी सहायक नदियों में जाने से रोकने की जरूरत बताती हैं।
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मेटा विवरण
कैग की रिपोर्ट में उत्तराखंड में नमामि गंगे योजना के तहत सीवेज प्रबंधन की कमियां सामने आईं। देवप्रयाग से हरिद्वार तक कोलीफॉर्म स्तर 32 गुना बढ़ा।

