अभियोजन निदेशक पद पर पुलिस अधिकारी की नियुक्ति पर हाईकोर्ट सख्त, उत्तराखंड सरकार से मांगा जवाब
नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य के अभियोजन निदेशक (डायरेक्टर ऑफ प्रॉसिक्यूशन) के पद पर पुलिस अधिकारी की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। अदालत ने सरकार से पूछा है कि इस पद पर नियुक्ति के लिए लागू नियम क्या हैं और एक महीने के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने की। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि पूर्व में भी राज्य सरकार से इस संबंध में जवाब मांगा गया था, लेकिन अब तक कोई उत्तर दाखिल नहीं किया गया है।
यह याचिका केशर सिंह चौहान ने दायर की है। याचिका में कहा गया है कि उत्तराखंड राज्य गठन के लगभग 26 वर्ष बाद भी अभियोजन निदेशक का पद लगातार पुलिस अधिकारियों को दिया जाता रहा है, जो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 20 के प्रावधानों के विपरीत है।
याचिका के अनुसार, कानून में प्रावधान है कि अभियोजन निदेशक के पद पर सेवानिवृत्त सत्र न्यायाधीश या कम से कम 15 वर्ष का अधिवक्ता अनुभव रखने वाले वकील की नियुक्ति की जानी चाहिए। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस पद पर पुलिस अधिकारी की नियुक्ति न केवल वैधानिक प्रावधानों के खिलाफ है, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के भी अनुरूप नहीं है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि अभियोजन विभाग का उद्देश्य पुलिस से स्वतंत्र रहकर निष्पक्ष रूप से आपराधिक मामलों का संचालन करना है। ऐसे में विभाग का नेतृत्व किसी पुलिस अधिकारी के हाथ में होने से अभियोजन की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है और निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया पर भी प्रश्न उठ सकते हैं।
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से अनुरोध किया है कि राज्य सरकार को कानून में निर्धारित पात्रता रखने वाले सेवानिवृत्त सत्र न्यायाधीश या कम से कम 15 वर्ष का अनुभव रखने वाले अधिवक्ता की नियुक्ति करने के निर्देश दिए जाएं।
यह मामला अभियोजन व्यवस्था की स्वतंत्रता और कानून के प्रावधानों के पालन से जुड़ा है। हाईकोर्ट के अंतिम निर्णय से राज्य में अभियोजन विभाग में नियुक्तियों की प्रक्रिया और भविष्य की प्रशासनिक व्यवस्था पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है।
