उत्तराखंड निकायों में लिपिक और सफाई निरीक्षकों को सौंपी गई अधिशासी अधिकारी की जिम्मेदारी, नियुक्तियों पर उठे सवाल
उत्तराखंड शहरी विकास निदेशालय ने राज्य के विभिन्न नगर निकायों में लिपिक, सफाई निरीक्षक, कर एवं राजस्व निरीक्षक तथा लेखा कर्मचारियों को प्रभारी अधिशासी अधिकारी (ईओ) की जिम्मेदारी सौंप दी है। इन नियुक्तियों के बाद सेवा नियमों और चयन प्रक्रिया को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
बताया जा रहा है कि कई नियमित अधिशासी अधिकारियों का तबादला नगर निगमों में होने के कारण नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों में कई पद रिक्त हो गए थे। विभाग में करीब 60 अधिशासी अधिकारी होने के बावजूद रिक्त पदों को भरने के लिए कर्मचारियों को प्रभारी अधिशासी अधिकारी का दायित्व सौंपा गया है।
अपर सचिव एवं निदेशक शहरी विकास विनोद गिरी गोस्वामी के नाम से जारी आदेश के अनुसार, सतीश कुमार (महुआखेड़ागंज), हेमंत कुमार गुप्ता (लंढौरा), गुरमीत सिंह (लंढौरा), रोशन सिंह पुंडीर (गौचर), तारिक खान (टिहरी), सरोज गौतम (नानकमत्ता), पूजा (बाजपुर), अंकित राणा (पिरान कलियर), कुलदीप चौहान (धनौरी), यशवीर सिंह (तपोवन), दीपक बुढ़लाकोटी (कालाढूंगी), भरत पंवार (देवप्रयाग), कुलदीप नैथानी (ऊखीमठ), राकेश कोटिया (जसपुर), कुसुम मटूड़ा (उत्तरकाशी), वासुदेव डंगवाल (चमियाला), पंकज सिंह (लालकुआं) और प्रेम सिंह रावत (बड़कोट) को प्रभारी अधिशासी अधिकारी बनाया गया है।
इन नियुक्तियों पर इसलिए सवाल उठ रहे हैं क्योंकि उत्तराखंड स्थानीय निकाय (केंद्रीकृत) सेवा नियमावली, 2019 के तहत अधिशासी अधिकारी के पद पर नियुक्ति निर्धारित सेवा अवधि पूरी होने पर पदोन्नति या उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के माध्यम से सीधी भर्ती से की जाती है।
सफाई निरीक्षकों को भी प्रभारी अधिशासी अधिकारी बनाए जाने पर आपत्ति जताई जा रही है। आलोचकों का कहना है कि यह पद उनके पदोन्नति क्रम का हिस्सा नहीं है और इस प्रकार की नियुक्तियां स्थापित भर्ती नियमों के अनुरूप नहीं हैं। इस संबंध में वर्ष 2017 के उत्तर प्रदेश शासनादेश का भी हवाला दिया जा रहा है, जिसमें अधिशासी अधिकारी का प्रभार केवल उप जिलाधिकारी स्तर के अधिकारियों को दिए जाने का प्रावधान था। उत्तराखंड में भी लंबे समय से इसी व्यवस्था का पालन होता रहा है।
यह मामला उत्तराखंड हाईकोर्ट के 2 मई 2025 के उस आदेश के बाद भी चर्चा में है, जिसमें शहरी विकास सचिव को नगर निकायों में कर्मचारियों की कमी और प्रभारी व्यवस्था को लेकर दायर याचिका पर निर्णय लेने के निर्देश दिए गए थे। याचिका में कहा गया था कि लिपिकीय कर्मचारियों को प्रशासनिक पदों का प्रभार देने से निकायों के कामकाज और जनसेवाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
शहरी विकास मंत्री राम सिंह कैड़ा ने नियुक्तियों का बचाव करते हुए कहा कि यह कोई नई व्यवस्था नहीं है। उन्होंने कहा कि जिन कर्मचारियों ने पहले भी प्रभारी अधिशासी अधिकारी के रूप में कार्य किया है, उन्हें ही रिक्त पदों पर दोबारा जिम्मेदारी सौंपी गई है।
